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भारत-पाक शांति बहाली के लिए 117 नामचीन हस्तियों का साझा पत्र: कड़े सैन्य तनाव और कूटनीतिक गतिरोध के बीच संवाद शुरू करने की बड़ी अपील

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Posted On:Thursday, July 2, 2026

दक्षिण एशियाई भू-राजनीति के विखंडनकारी दौर में शांति स्थापना के लिए एक बेहद कड़ा और कूटनीतिक प्रयास सामने आया है। भारत और पाकिस्तान की 117 प्रमुख और प्रख्यात हस्तियों ने एकजुट होकर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को एक ऐतिहासिक संयुक्त पत्र (Joint Letter) भेजा है। 'सेंटर फॉर पीस एंड प्रोग्रेस' (CPP) के बैनर तले जारी इस कूटनीतिक पहल में दोनों देशों से आपसी दुश्मनी को विधिक रूप से भुलाकर द्विपक्षीय बातचीत, सीमा पार व्यापार, वीजा सरलीकरण, बस सेवाओं और करतारपुर कॉरिडोर के पूर्ण संचालन सहित 11 कड़े और विलेख मुद्दों पर दोबारा काम शुरू करने की जोरदार वकालत की गई है। इस पत्र पर भारत की ओर से फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, मणि शंकर अय्यर और पूर्व रॉ प्रमुख ए.एस. दुलत, जबकि पाकिस्तान की तरफ से पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी और न्यूक्लियर साइंटिस्ट परवेज हूडभॉय जैसी कड़क हस्तियों ने विधिक दस्तखत किए हैं।

यह कूटनीतिक पहल ऐसे संवेदनशील समय पर हुई है जब दोनों देशों के बीच लॉजिस्टिक्स और सुरक्षा संबंध अपने सबसे निचले स्तर पर हैं। अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए विखंडनकारी आतंकी हमले, जिसमें 26 नागरिकों की जान गई थी, के कड़े जवाब में भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन सिंदूर' चलाकर सीमा पार नौ आतंकी ठिकानों को विखंडनकारी चोट पहुंचाई थी। इसके बाद सिंधु जल संधि के निलंबन और कूटनीतिक संबंधों के पूरी तरह ठप होने से दोनों परमाणु संपन्न पड़ोसियों के बीच अविश्वास की खाई अत्यधिक कड़क हो चुकी है। वर्ष 2016 के पठानकोट हमले के बाद से ही दोनों पक्षों के बीच कोई आधिकारिक वार्ता नहीं हुई है।

इस संयुक्त शांति पत्र पर दोनों देशों के राजनीतिक गलियारों में कड़ा रुख देखने को मिल रहा है। जहां भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने साफ संदेश दिया है कि 'पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते' और सीमा पार आतंकवाद के पूर्ण खात्मे के बिना किसी भी कूटनीतिक संवाद के लॉजिस्टिक्स की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया है, वहीं कांग्रेस ने भी ऐतिहासिक अनुभवों का हवाला देकर आतंकवाद के साये में जनरलाइजेशन की बातों का कड़ा विरोध किया है। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, भले ही शांति बहाली से पूरे दक्षिण एशिया को व्यापक आर्थिक और व्यापारिक लाभ मिल सकता है, लेकिन दशकों की पुरानी दुश्मनी, सुरक्षा चिंताओं और भरोसे की भारी कमी के कारण मौजूदा विखंडनकारी माहौल में किसी बड़े चमत्कार की उम्मीद विधिक रूप से बेहद कम नजर आती है।


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