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MSME संशोधन विधेयक 2026: ₹8.1 लाख करोड़ के फंसे भुगतान से मिलेगी राहत; जानें नए कानून के फायदे

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Posted On:Saturday, August 8, 2026

देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME Sector) के लिए एक बड़ी राहत की खबर है। संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) ने माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज डेवलपमेंट (अमेंडमेंट) बिल, 2026 को सर्वसम्मति से पारित कर दिया है।

हाल ही में पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे 2026 के अनुसार, देश के छोटे कारोबारियों का लगभग ₹8.1 लाख करोड़ का भारी-भरकम भुगतान बड़ी खरीदार कंपनियों और कॉर्पोरेट्स के पास फंसा हुआ है। समय पर पैसा न मिलने से MSMEs की 'वर्किंग कैपिटल' (कार्यशील पूंजी) ठप हो जाती है, जिससे उन्हें महंगे ब्याज पर कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

क्यों पड़ी नए कानून की जरूरत? (2006 एक्ट की कमियां)

पुराने MSMED अधिनियम, 2006 में कई ऐसी खामियां थीं जिनका फायदा उठाकर बड़ी कंपनियां भुगतान टालती रहती थीं:

  1. समय-सीमा का अभाव: विवादों को सुलझाने के लिए बनी मध्यस्थता (Mediation & Arbitration) प्रक्रिया के लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं थी, जिससे मामले सालों-साल एमएसएमई समाधान (Samadhaan Portal) और अदालतों में लटके रहते थे।

  2. दंड के पुराने प्रावधान: छोटी-मोटी तकनीकी चूकों या पंजीकरण संबंधी गलत जानकारियों पर अत्यधिक सख्त और आपराधिक मुकदमे चलाने की जटिल व्यवस्था थी, जिससे कारोबारी परेशान होते थे।

MSME (संशोधन) विधेयक 2026 के मुख्य बिंदु और फायदे

1.45 दिनों के भीतर अनिवार्य भुगतान:भुगतान न करने पर कड़ा वित्तीय जुर्माना.

संशोधित कानून के तहत खरीदार कंपनियों को माल या सेवाएं प्राप्त होने के अधिकतम 45 दिनों (अनुबंध न होने पर 15 दिनों) के भीतर भुगतान करना ही होगा। देरी करने पर कंपनियों को RBI द्वारा तय बैंक दर से 3 गुना अधिक चक्रवृद्धि ब्याज (Compound Interest) देना होगा।


2.फास्ट-ट्रैक विवाद निपटारा:90 दिनों के भीतर फैसला अनिवार्य.

भुगतान में देरी से जुड़े मामलों को अब एमएसएमई सुविधा परिषद (MSEFC) को 90 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से सुलझाना होगा। इससे सालों तक लटकने वाले मामलों का त्वरित समाधान संभव हो सकेगा।


3.अपराधिक कार्रवाई की जगह पेनल्टी:कारोबार की सुगमता (Ease of Doing Business).

छोटी-मोटी प्रशासनिक चूक या गलत जानकारी देने पर अदालती मुकदमों (Criminalization) के बजाय केवल वित्तीय जुर्माना (Financial Penalty) लगाने की पारदर्शी व्यवस्था बनाई गई है।


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