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1 लीटर इथेनॉल उत्पादन में 10 हजार लीटर पानी बर्बाद होने का दावा खारिज: BIEPA ने स्पष्ट किया वास्तविक गणित, 4 लीटर पानी की ही पड़ती है जरूरत

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Posted On:Saturday, August 8, 2026

देश में पेट्रोल के साथ इथेनॉल ब्लेंडिंग (Ethanol Blending) कार्यक्रम के विस्तार के बीच इसके पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर सोशल मीडिया और विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर चल रही भ्रामक खबरों पर विराम लग गया है। भारत इंडिपेंडेंट इथेनॉल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (BIEPA) के अध्यक्ष पुष्पिंदर सिंह ने 1 लीटर इथेनॉल के निर्माण में 10,000 लीटर पानी बर्बाद होने के दावों को पूरी तरह से तथ्यहीन और भ्रामक करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि आधुनिक डिस्टिलरी और इथेनॉल प्लांट्स में 1 लीटर इथेनॉल तैयार करने के लिए वास्तव में केवल 4 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा इथेनॉल संयंत्रों को पर्यावरणीय मंजूरी (Environmental Clearance) देते समय भी इसी 4 लीटर प्रति लीटर इथेनॉल के मानक को आधिकारिक और वैध माना जाता है। पुष्पिंदर सिंह के अनुसार, 10,000 लीटर पानी की बर्बादी का भ्रम दरअसल गन्ने और चावल जैसी मुख्य फसलों की पूरी कृषि जीवनचक्र (Crop Lifecycle) में सिंचाई के लिए उपयोग किए जाने वाले कुल पानी की गणना के कारण पैदा हुआ है। किसान इन फसलों को इथेनॉल के लिए नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और अनाज आपूर्ति के लिए उगाते हैं।

इथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने के उप-उत्पाद (मिलासिस/शीरा), टूटे हुए चावल, मक्का और अधिशेष खाद्यान्न से किया जाता है। इसके अतिरिक्त, भूजल स्तर (Groundwater Level) घटने की आशंकाओं को खारिज करते हुए BIEPA ने बताया कि अधिकांश इथेनॉल डिस्टिलरीज भूजल का दोहन नहीं करती हैं, बल्कि सरकारी आवंटन के तहत नदियों, नहरों और जलाशयों से प्राप्त सतही जल (Surface Water) का उपयोग करती हैं। जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) तकनीक के कारण आधुनिक संयंत्रों में जल का पुनर्चक्रण भी बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।


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