अहमदाबाद न्यूज डेस्क: गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर भाजपा के वर्चस्व को साबित कर दिया है, जहाँ पार्टी ने 95 प्रतिशत सीटों पर कब्जा जमाकर इतिहास रच दिया। भाजपा ने 15 महानगरपालिकाओं और सैकड़ों जिला व तहसील पंचायतों की कुल 9992 सीटों में से 7491 पर जीत दर्ज की। हालाँकि, इस प्रचंड लहर के बीच अहमदाबाद का 'खाड़िया' वार्ड चर्चा का विषय बना रहा, जिसे जनसंघ के जमाने से भाजपा का सुरक्षित गढ़ माना जाता था। करीब 50 साल बाद यहाँ भाजपा को हार का स्वाद चखना पड़ा, जिसे पार्टी के लिए एक बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है।
विपक्ष की बात करें तो अहमदाबाद में कांग्रेस को नया जीवनदान मिला है, जिसका मुख्य कारण असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM का पूरी तरह सफाया होना रहा। पिछली बार सात सीटें जीतने वाली AIMIM इस बार अपना खाता भी नहीं खोल पाई, जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिला। अहमदाबाद महानगरपालिका की 192 सीटों में से भाजपा ने 160 और कांग्रेस ने 32 सीटों पर जीत हासिल की। वहीं सूरत में आम आदमी पार्टी (AAP) को मतदाताओं ने पूरी तरह नकार दिया, जिससे उसकी सीटें 27 से घटकर मात्र 4 रह गईं। सूरत में 10 साल के लंबे इंतजार के बाद कांग्रेस फिर से अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रही।
इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा मेहसाणा के नवनिर्वाचित पार्षद रमेश भील की हो रही है। रमेश पिछले 28 वर्षों से भाजपा के जिला कार्यालय में चाय बनाने का काम कर रहे हैं। पार्टी ने उनकी निष्ठा को देखते हुए उन्हें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित वार्ड से टिकट दिया, जहाँ उन्होंने शानदार जीत हासिल की। रमेश की सादगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पार्षद बनने के बाद भी उन्होंने साफ कर दिया है कि वे पार्टी कार्यालय में अपनी चाय बनाने की नौकरी जारी रखेंगे। भाजपा ने इस प्रयोग के जरिए संदेश दिया है कि उनके यहाँ एक साधारण कार्यकर्ता भी ऊँचे पद तक पहुँच सकता है।
समग्र रूप से देखा जाए तो भाजपा ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में अपनी पकड़ और मजबूत की है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण और ओबीसी आरक्षण लागू होने के बाद यह पहला बड़ा चुनाव था, जिसमें भाजपा ने विरोधियों को पछाड़ दिया। अहमदाबाद के मेयर पद के लिए अब ओबीसी नेता हितेश बारोट का नाम सबसे आगे चल रहा है। कांग्रेस जहाँ अपनी संगठनात्मक कमजोरी के कारण पिछड़ गई, वहीं आम आदमी पार्टी के आंतरिक कलह ने उसे भारी नुकसान पहुँचाया। इन नतीजों ने गुजरात की राजनीति में भाजपा की जड़ें और गहरी कर दी हैं।